NCERT
Class 10
Science
Chapter 5
Periodic classification of elements
तत्वों के वर्गीकरण के प्रारंभिक प्रयास :-सबसे पहले ज्ञात तत्वों को धातु एवं अधातु में वर्गीकृत किया गया जैसे-जैसे तत्व एवं उनके गुण धर्मों के बारे में हमारा ज्ञान बढ़ता गया वैसे-वैसे उन्हें वर्गीकृत करने के प्रयास किए गए।
1. डाबेराइनर के त्रिक :- इस नियमानुसार जब तत्वों को बढ़ते हुए परमाणु द्रव्यमान ओं के क्रम में क्रम आयोजित किया जाता है तो समान रासायनिक गुणधर्म वाले तीन तत्वों के समूह (त्रिक) प्राप्त होते हैं।
त्रिक के बीच के तत्व का परमाणु द्रव्यमान अन्य दो तत्वों के परमाणु द्रव्यमान के अंकगणितीय मध्यमान के बराबर होता है।
** डाबेराइनर उस समय तक ज्ञात तत्वों में केवल 3 त्रिक ही ज्ञात कर सके थे। इसलिए त्रिक में वर्गीकृत करने की यह पद्धति सफल नहीं रही।
2. न्यूलैंड का अष्टक नियम :- सन 1866 में अंग्रेज वैज्ञानिक जान न्यूलैंड ने ज्ञात तत्वों को परमाणु द्रव्यमान के आरोही क्रम में व्यवस्थित किया। इसके अनुसार -
"जब तत्वों को बढ़ते हुए परमाणु द्रव्यमानों के क्रम में रखा जाता है तो प्रत्येक आठवें तत्व का गुणधर्म पहले तत्व के गुणधर्म के समान होता है"
इन्होंने सबसे कम परमाणु द्रव्यमान वाले हाइड्रोजन से आरंभ किया तथा 56 में तत्व थोरियम पर इसे समाप्त किया।
न्यूलैंड का अष्टक नियम का वर्गीकरण -
न्यूलैंड सिद्धांत की सीमाएं :-
** यह नियम केवल कैल्शियम तक ही लागू होता था क्योंकि कैल्शियम के बाद प्रत्येक आठवें तत्व का गुणधर्म पहले तत्व से नहीं मिलता ।
** न्यूलैंड ने कल्पना की प्रकृति में केवल 56 तत्व विद्यमान है। तथा भविष्य में कोई अन्य तत्व नहीं मिलेगा। लेकिन बाद में कई नए तत्व पाए गए हैं। जिनके गुणधर्म इस सिद्धांत से मेल नहीं खाते थे।
** अपनी सारणी में इन तत्वों को फिट करने के लिए न्यूलैंड ने दो तत्वों को एक साथ रख दिया और कुछ असमान तत्वों को एक स्थान में रख दिया जिनके गुणधर्म तत्वों से काफी भिन्न थे।
** आयरन तत्व जो गुणधर्मों में कोबाल्ट एवं निकिल के समान है को इन तत्वों से काफी दूर रखा गया था।
मेंडलीफ की आवर्त सारणी :- तत्वों के वर्गीकरण का मुख्य श्रेय रूसी रसायन शास्त्री दमित्री इवानोविच मेंडलीफ को जाता है।
जब मेंडलीफ ने अपना कार्य आरंभ किया तब तक 63 तत्व ज्ञात थे। रासायनिक गुण धर्मों के अंतर्गत मेंडलीफ ने तत्वों के ऑक्सीजन एवं हाइड्रोजन के साथ बनने वाले योगिको पर अपना ध्यान केंद्रित किया। क्योंकि ये अत्यंत सक्रिय हैं तथा अधिकांश तत्वों के साथ योगिक बनाते हैं। तत्व से बनने वाले हाइड्राक्साइड एवं ऑक्साइड के सूत्र को तत्वों के वर्गीकरण के लिए मूलभूत गुण धर्म माना गया ।
इसके अनुसार
" तत्वों के भौतिक तथा रासायनिक गुणधर्म उनके परमाणु द्रव्यमानों के आवर्ती फलन होते हैं "
इसकी आवर्त सारणी में ऊर्ध्व पंक्तियों को समूह तथा क्षैतिज पंक्तियों को आवर्त कहते हैं।
मेंडलीफ की आवर्त सारणी की उपलब्धियां :-
1. मेंडलीफ ने आवर्त सारणी के कुछ तत्वों के अस्तित्व की भविष्यवाणी की थी जो उस समय तक खोजे नहीं गए थे।
2. यह सारणी अनेक तत्वों के गुण धर्मों की आवर्त सारणी में उनके स्थान के आधार पर भविष्यवाणी करने में सफल हो सकी।
3. यह सारणी उत्कृष्ट गैसों के लिए पहले से ही पृथक समूह का निर्धारण करती है। जिससे इन गैसों की खोज के बाद अन्य तत्वों को उनके स्थानों से नहीं हटाया जा सकता।
मेंडलीफ के वर्गीकरण की सीमाएं :-
1. इस वर्गीकरण से समस्थानिकों की स्थिति को नहीं समझाया जा सकता था।
2. कुछ तत्व के परमाणु द्रव्यमानों के अनुचित क्रम को नहीं समझाया जा सकता था।
3. आवर्त सारणी में हाइड्रोजन की उचित स्थिति को निर्धारित नहीं किया जा सकता था।
आधुनिक आवर्त सारणी :- सन 1913 में हेनरी मोसले ने बताया कि तत्वों के परमाणु द्रव्यमान की तुलना में उसकी परमाणु संख्या अधिक आधारभूत गुणधर्म है।
इसके अनुसार
"तत्वों के भौतिक तथा रासायनिक गुणधर्म उनकी परमाणु संख्या या परमाणु क्रमांक के आवर्ती फलन होते हैं"
परमाणु संख्या से परमाणु के नाभिक में स्थित प्रोटानों की संख्या का पता चलता है। तथा एक तत्व से दूसरे तत्व तक बढ़ने पर इस संख्या में एक की बढ़ोतरी होती है। तत्वों को उनकी परमाणु संख्या के आरोही क्रम में व्यवस्थित करने पर जो वर्गीकरण प्राप्त होता है उसे आधुनिक आवर्त सारणी कहा जाता है।
आधुनिक आवर्त सारणी में तत्वों की स्थिति :- इसमें 18 ऊर्ध्व स्तंभ (समूह) तथा 7 पक्तियां (आवर्त) होती है।
1. एक ही समूह के सभी तत्वों के संयोजकता इलेक्ट्रॉन की संख्या समान है। जैसे फ्लोरीन एवं क्लोरीन समूह 17 के तत्व है।
2. किसी आवर्त में तत्वों की संख्या इलेक्ट्रॉन की अधिकतम संख्या द्वारा निर्धारित होती है। जो परमाणु के विभिन्न कोशों में स्थान ग्रहण कर सकते हैं।
3. समूह में ऊपर से नीचे की ओर जाने पर कोशों की संख्या बढ़ती जाती है।
4. आवर्त में बाएं से दाएं और जाने पर यदि परमाणु संख्या में इकाई वृद्धि होती है । तो संयोजकता इलेक्ट्रॉन की संख्या में भी इकाई वृद्धि होती है।
5. अध्यासित कोशों की समान संख्या वाले विभिन्न तत्वों के परमाणु एक ही आवर्त में स्थित हैं । जैसे तीसरे आवर्त में सोडियम, मैग्निशियम, ऐलमुनियम, सिलिकॉन, फास्फोरस, सल्फर, क्लोरीन एवं आर्गन है।
6. समूह के सभी तत्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास समान होते है जो कि समान गुणधर्म दर्शाते हैं।
7. सभी उत्कृष्ट गैसों की संयोजकता कोश इलेक्ट्रॉन से पूर्णत: भरे होते हैं।
8. किसी कोश में इलेक्ट्रॉन की अधिकतम संख्या एक सूत्र पर 2n² निर्भर करती है।
n = नाभिक में नियत कोश की संख्या
9. आवर्त सारणी में धातुओं को उप धातुओं नामक कुछ तत्वों द्वारा अधातुओं से पृथक किया गया है।
10. इसमें हाइड्रोजन की स्थिति अनिश्चित रहती है क्योंकि इसे पहले आवर्त के समूह 1 या समूह 17 में भी रखा जा सकता है।
आधुनिक आवर्त सारणी की विशेषताएं या प्रवृत्ति :-
1. संयोजकता :- किसी भी तत्वों की संयोजकता उसके परमाणु के सबसे बाहरी कोश में उपस्थित संयोजी इलेक्ट्रॉन की संख्या से निर्धारित होती है।
प्रत्येक लघु आवर्त में बाएं से दाएं चलने पर तत्वों की संयोजकता 1 से 4 तक बढ़ती है और फिर 0 तक घटती है।
2. परमाणु साइज या आकार :- परमाणु आकार से परमाणु की त्रिज्या का पता चलता है। एक स्वतंत्र परमाणु के केंद्र से उसके बाहरी कोश की दूरी ही परमाणु के आकार को दर्शाती है परमाणु त्रिज्या को पीकोमीटर (Pm) में व्यक्त करते हैं।
1 Pm = 10⁻¹² m
हाइड्रोजन की त्रिज्या सबसे कम 37pm होती है।
** आवर्त में बाएं से दाएं और जाने पर परमाणु त्रिज्या घटती है।
** नाभिक में आवेश बढ़ने से यह इलेक्ट्रॉन को नाभिक की ओर खींचता है जिससे परमाणु का आकार घटता है।
** समूह में ऊपर से नीचे जाने पर परमाणु आकार बढ़ता है।
** नीचे जाने पर एक नया कोश जुड़ जाता है । इससे नाभिक तथा सबसे बाहरी कोश के बीच दूरी बढ़ जाती है। इस कारण नाभिक का आवेश बढ़ जाने के बाद भी परमाणु आकार बढ़ता है।
3. धात्विक एवं अधात्विक गुणधर्म : - सोडियम एवं मैग्निशियम जैसी धातुएं आवर्त सारणी के बाएं तथा सल्फर एवं क्लोरीन जैसी अधातुएं आवर्त सारणी में दाएं और स्थित होती है मध्य में सिलिकॉन जैसी उपधातु स्थित होती है।
** आवर्त में बाएं से दाएं बढ़ने पर तत्वों का धात्विक लक्षण घटता है । लेकिन अधात्विक लक्षण बढ़ता है।
** बाएं से दाएं जाने पर धन विधुती लक्षण करता है । जबकि ऋण विधुती लक्षण बढ़ता है।
** बाएं से दाएं जाने पर परमाणु की इलेक्ट्रॉन त्यागने की प्रवृत्ति घटती है। जबकि इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति बढ़ती है।
" धातुएं धन विधुती तथा अधातु ऋण विधुती होती हैं "
=> विद्युत ऋणात्मकता की प्रवृत्ति के अनुसार अधातुएं आवर्त सारणी के दाहिनी और ऊपर की ओर स्थित होती हैं।
=> धातुओं के ऑक्साइड क्षारीय तथा अधातुओं के ऑक्साइड सामान्यतः अम्लीय होते हैं।




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