विद्युत ( electricity)
आधुनिक समय में विद्युत ऊर्जा का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। जिसका उपयोग घरों में, उद्योग में, परिवहन आदि में किया जाता है।
विद्युत धारा :- विद्युत आवेश के प्रवाह की दर को विद्युत धारा कहते हैं।
विद्युत आवेश :- विद्युत आवेश चालक में से प्रवाहित होता है (उदाहरण धातु के तार में से) जिस कारण विद्युत धारा उत्पन्न होती है।
वैद्युत आवेश के प्रमुख गुण निम्न है।
** विपरीत आवेश एक दूसरे को आकर्षित करते हैं। (+ve एवं -ve)
** समान आवेश एक दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं।( +ve एवं +ve तथा -ve एवं -ve)
विद्युत परिपथ में इलेक्ट्रॉन के प्रवाह की दिशा के विपरीत दिशा को विद्युत धारा की दिशा माना जाता है।
यदि किसी चालक की किसी भी अनुप्रस्थ काट से t समय में नेट आवेश Q प्रवाहित होता है। तब उस अनुप्रस्थ काट से प्रवाहित धारा I = Q/t होगा।
I = Q/t
I = विद्युत धारा
Q = विद्युत आवेश
t = समय
** विद्युत आवेश का एसआई मात्रक कूलाम (C) होता है जो लगभग 6*10¹⁸ इलेक्ट्रॉन के आवेश के बराबर होता है।
** विद्युत धारा का मात्रक एंपियर (A) होता है।
** 1 एंपियर = प्रति सेकंड एक कूलाम आवेश का प्रवाह
चालक ( Conductor) :- वे पदार्थ जिनसे होकर विद्युत का प्रभाव हो सकता है चालक कहलाते हैं। पदार्थ में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति ही उसे चालक बनाती है।
उदाहरण - लोहा, तांबा, सोना, चांदी आदि।
विद्युत रोधक ( Insulator) :- वे पदार्थ जिनसे होकर विद्युत का प्रवाह नहीं हो सकता विद्युत रोधक कहलाते हैं। उदाहरण - प्लास्टिक, कांच, कागज आदि।
ऐमीटर - इस यंत्र का उपयोग विद्युत परिपथ में विद्युत धारा मापने में किया जाता है।
विद्युत परिपथ - एक सेल, एक विद्युत बल्ब, एक ऐमीटर तथा प्लग मिलकर विद्युत परिपथ बनाते हैं। इसमें सेल के दो सिरों के बीच एक स्विच तथा तारों और अन्य प्रतिरोध युक्त अविच्छिन्न चालक पद जिसके साथ साथ विद्युत धारा प्रवाहित होती है परिपथ कहलाता है।
** विद्युत धारा, चालक में विद्युत आवेशों (इलेक्ट्रॉन) का प्रवाह है।
विद्युत विभव :- विद्युत क्षेत्र में किसी बिंदु पर विद्युत विभव को अनंत से उस बिंदु तक इकाई धनात्मक आवेश को चलने में किए गए कार्य के रूप में परिभाषित किया जाता है।
विभवांतर :- विद्युत परिपथ के दो बिंदुओं के बीच विभवांतर वह कार्य है। जो एकांक आवेश को एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक लाने में किया जाता है।
विभवांतर (v) = किया गया कार्य (w)/आवेश (Q)
** विभवांतर का एस आई मात्रक वोल्ट (v) होता है।
1 वोल्ट (v) = किसी विद्युत धारावाही चालक के दो बिंदुओं के बीच एक कूलाम आवेश को एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक ले जाने में एक जूल कार्य किया जाता है।
1 वोल्ट (v) = 1 जूल (J)/ 1 कूलाम (c)
** विभवांतर को वोल्ट मीटर द्वारा मापा जाता है।
विद्युत परिपथ आरेख: - विद्युत परिपथ में हम विभिन्न विद्युत अवयवों जैसे बैटरी, बल्ब, चालक तार, प्रतिरोध, धारामापी, स्विच, वोल्टमापी आदि दर्शाते हैं।
धारा नियंत्रक = परिवर्ती प्रतिरोध को धारा नियंत्रक कहा जाता है।
परिपथ आरेख :- वह आरेख जो सूचित करता है कि, अवयवों के लिए विद्युत प्रतीकों का प्रयोग करके परिपथ में विभिन्न अवयवों को किस प्रकार जोड़ा गया है परिपथ आरेख कहलाता है।
ओम का नियम :- स्थिर ताप पर किसी धातु के तार में प्रवाहित होने वाली विद्युत धारा उस तार के सिरों के बीच विभवांतर के अनुक्रमानुपाती होती है।
यदि विद्युत धारा आई तथा विभवांतर भी है तो ओम के नियमानुसार -
R (नियतांक) :- R नियतांक को तार का प्रतिरोध कहते हैं।
प्रतिरोध किसी चालक का वह गुण है जो अपने में प्रवाहित होने वाले आवेश के प्रवाह का विरोध करता है। इसका मात्रक ओम(Ω) है।
यदि किसी चालक के दोनों सिरों के बीच विभांतर एक वोल्ट है । तथा उससे 1 एंपियर विद्युत धारा प्रवाहित होती है तब चालक का प्रतिरोध 1 ओम होगा।
नाइक्रोम तार के लिए विभवांतर (v), धारा (I) सरल रेखीय ग्राफ यह दर्शाता है कि जैसे-जैसे तार में प्रवाहित विद्युत धारा बढ़ती है विभवांतर रिक्ता पड़ता है यही ओम का नियम है।
परिवर्ती प्रतिरोध :- स्रोत की वोल्टता में बिना कोई परिवर्तन किए परिपथ की विद्युत धारा को नियंत्रित करने के लिए उपयोग किए जाने वाले अवयव को परिवर्ती प्रतिरोध कहते हैं।
धारा नियंत्रक :- विद्युत परिपथ में परिपथ के प्रतिरोध को परिवर्तित करने में जिस युक्ति का प्रयोग किया जाता है, धारा नियंत्रक कहलाता है।
इलेक्ट्रॉन की किसी परिपथ में गति के कारण हैं परिपथ में कोई विद्युत धारा बनती है। चालक के भीतर इलेक्ट्रॉन गति करने के लिए पूर्णता स्वतंत्र नहीं होते। जिन परमाणु के बीच यह गति करते हैं, उन्हीं के आकर्षण द्वारा इनकी गति नियंत्रित हो जाती है। चालक से होकर इलेक्ट्रॉन की गति उसके प्रतिरोध द्वारा मंद हो जाती है।
** वाह चालक अच्छा माना जाता है जिसका प्रतिरोध कम होता है।
किसी चालक का प्रतिरोध निर्भर करता है: -
1:- चालक की लंबाई पर
2:- चालक की अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल (चालक की मोटाई) पर
3:- चालक के पदार्थ की प्रकृति पर
4:- चालक के ताप पर
प्रतिरोधकता :- किसी धातु के एक समान चालक का प्रतिरोध उसकी लंबाई के अनुक्रमानुपाती तथा उसकी अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
ρ को चालक के पदार्थ की वैधुत प्रतिरोधकता कहते हैं।
प्रतिरोधकता का एस आई मात्रक ओम मीटर(Ωm) है।
** धातु एवं विश्व धातुओं की प्रतिरोधकता अत्यंत कम होती है।
** किसी पदार्थ की प्रतिरोधकता तथा प्रतिरोध दोनों ही आप परिवर्तन पर परिवर्तित हो जाते हैं।
** चांदी धातु विद्युत का उत्तम चालक है।
** विद्युत संचरण के लिए कॉपर एवं एलुमिनियम तारों का प्रयोग किया जाता है, ये अत्यल्प प्रतिरोधी होते हैं।
प्रतिरोधों का संयोजन :- प्रतिरोधों को परस्पर संयोजित करने की दो विधियां है।
1:- श्रेणी क्रम संयोजन
2:- पार्श्व क्रम क्या समांतर क्रम संयोजन
** श्रेणी क्रम में प्रतिरोधों को क्रमशः एक छोर से दूसरे सिरे तक मिलाकर जोड़ा जाता है।
** पार्श्व क्रम में प्रतिरोधों को एक साथ बिंदु X तथा Y के बीच संयोजित किया जाता है।
श्रेणी क्रम में संयोजित प्रतिरोध :- श्रेणी क्रम में संयोजित प्रतिरोधों की किसी संख्या का संयुक्त प्रतिरोध, प्रतिरोध के भाग के बराबर होता है।
उदाहरण - यदि अनेक प्रतिरोधों R1,R2,R3.... आदि को श्रेणी क्रम में संयोजित करते हैं तो उनके संयुक्त प्रतिरोध।
R = R1+R3+R3+.......... होता है।
प्रतिरोधों के श्रेणी क्रम संयोजन में परिपथ के हर भाग में विद्युत धारा समान होती है अर्थात प्रत्येक प्रतिरोध से समान विद्युत धारा प्रवाहित होती है।
श्रेणी क्रम में विभवांतर V अन्य तीन विभवांतरो V1, V2 एवं V3 के योग के बराबर होता है अर्थात प्रतिरोध के श्रेणी क्रम संयोजन के शेरों के बीच कुल विभवांतर व्यक्तिगत प्रतिरोधों के योग के बराबर होता है।
V = V1 +V2+V3
माना परिपथ की विद्युत धारा I है, तब प्रत्येक प्रतिरोध से प्रवाहित विद्युत धारा भी I है। श्रेणी क्रम में जुड़े इन तीनों प्रतिरोधों को एक ऐसे तुल्य प्रतिरोधक उसका प्रतिरोध R है के द्वारा प्रतिस्थापित करना संभव है। जिसे परिपथ में जोड़ने पर इसके सिरों पर प्रतिरोध V तथा परिपथ में प्रवाहित धारा I वही रहती है।
पार्श्व क्रम में संयोजित प्रतिरोध :- पार्श्व क्रम में संयुक्त अनेक प्रतिरोधों के संयुक्त प्रतिरोध का व्युत्क्रम सभी पृथक प्रतिरोधों के व्युत्क्रम के योग के बराबर होता है।
उदाहरण :- यदि अनेक प्रतिरोध R1,R2,R3 ...... आदि पार्श्व क्रम में संयुक्त होते हैं तो उनका संयुक्त प्रतिरोध निम्न सूत्र द्वारा बताया जाता है।
पार्श्व क्रम में कुल विद्युत धारा I संयोजन की प्रत्येक शाखा में प्रवाहित होने वाली पृथक धाराओं के योग के बराबर है।
I = I1+ I2+ I3 .....
माना प्रतिरोधों के पार्श्व क्रम संयोजन का तुल्य प्रतिरोध Rρ है प्रतिरोधों को के पार्षद संयोजन पर ओम का नियम लागू करने पर
** घरेलू विद्युत परिपथ = पार्श्व क्रम
** विद्युत बल्बों की लड़ी = श्रेणी क्रम
विद्युत धारा का तापीय प्रभाव :- विद्युत धारा को जब नाइक्रोम तार जैसे उच्च प्रतिरोध तार से गुजारते हैं तो प्रश्नोत्तर अत्यधिक गर्म हो जाता है और उसमें उत्पन्न करता है यह धारा का तापीय प्रभाव कहलाता है।
विद्युत धारा से खर्च हुई शोध की उर्जा का कुछ भाग उपयोगी कार्य करने (जैसे पंखों की पंखुड़ियां घुमाने में) में उपयोग हो जाता है तथा स्रोत की उर्जा का शेष भाग उष्मा उत्पन्न करने में खर्च हो जाता है।
स्रोत की ऊर्जा का निरंतर पूर्ण रूप से ऊष्मा के रूप में क्षयित होना ही विद्युत धारा का तापीय प्रभाव कहलाता है। जब विद्युत धारा प्रतिरोध तार में से प्रवाहित होती है तो विद्युत ऊर्जा, ऊष्मीय ऊर्जा में परिवर्तित होती है। इस प्रभाव का उपयोग विद्युत हीटर, विद्युत इस्त्री आदि में किया जाता है।
माना R प्रतिरोध में विद्युत धारा I प्रवाहित होती है तो इन के शेरों के बीच विभांतर V है। माना इससे t समय में Q आवेश प्रवाहित होता है। तो Q आवेश विभांतर V से प्रवाहित होने में किया गया कार्य VQ है।
अतः शॉट द्वारा परिपथ में निवेश इस शक्ति
P = VQ/t या P = VI { I= Q/t}
P = शक्ति
V = विभवांतर
Q = आवेश
t = समय
I = विद्युत धारा
किसी विद्युत धारा स्थाई आई द्वारा तय समय में उत्पन्न ऊष्मा की मात्रा H = VIt
ओम का नियम लागू करने पर
H = I²Rt
** यह जूल का तापन नियम कहलाता है।
जूल का तापन नियम :- किसी प्रतिरोध में उत्पन्न होने वाली उस्मा निम्नलिखित के अनुक्रमानुपाती होती है।
1. धारा के वर्ग के (I²)
2. तार के प्रतिरोध के (R)
3. समय के (t) [कुछ समय के जिसके लिए दिए गए प्रतिरोध से दूध धारा प्रवाहित होती है]
H = I²Rt
H = उत्पन्न ऊष्मा
I = विद्युत धारा
R = प्रतिरोध
t = समय
विद्युत धारा के तापीय प्रभाव के व्यवहारिक अनुप्रयोग :- किसी चालक में ऊष्मा उत्पन्न होना, विद्युत ऊर्जा का ऊष्मीय ऊर्जा में परिवर्तन के कारण है । इससे परिपथ के अवयवों के ताप में वृद्धि कर सकता है। इसका उपयोग विद्युत स्त्री, विद्युत टोस्टर, विद्युत तंदूर, विद्युत केतली तथा विद्युत मीटर में किया जाता है। इसका उपयोग प्रकाश उत्पन्न करने में भी होता है जैसे विद्युत बल्ब।
विद्युत शक्ति :- कार्य करने की दर को शक्ति कहते हैं। ऊर्जा के उपयोग होने की दर को भी शक्ति कहते हैं इसे P से प्रदर्शित करते हैं।
प्रथम सूत्र=> शक्ति = विभवांतर × धारा [ P =V×I ]
द्वितीय सूत्र=> शक्ति = धारा² × प्रतिरोध [ P = I²R]
तृतीय सूत्र=> शक्ति = विभवांतर²/प्रतिरोध [ P = V²/R]
विद्युत शक्ति का S I मात्रक वाट (W)है।
यह उस युक्ति द्वारा उत्पन्न शक्ति है। जिससे उस समय 1 एंपियर विद्युत धारा प्रवाहित होती है जब उसे एक विभवांतर पर प्रचलित कराया जाता है।
1 वाट = 1 वोल्ट × 1 एंपियर
1 W = 1 V × 1 A
वाट शक्ति का छोटा मात्रक है
1 Kw = 1000W
** विद्युत ऊर्जा, शक्ति तथा समय का गुणनफल होता है। इसलिए विद्युत ऊर्जा का मात्रक वाट घंटा(wh) है।
** जब एक वाट शक्ति का उपयोग 1 घंटे तक होता है। तो उपभोग ऊर्जा 1 वाट घंटा होती है।
** विद्युत ऊर्जा का व्यापारिक मात्रक किलो वाट घंटा(Kwh) है। जिसे सामान्य बोलचाल में यूनिट कहते हैं।
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