आनुवांशिकता एवं जैव विकास
माता-पिता से उनकी संतानों में लक्षणों का हस्तांतरण अनुवांशिकता कहलाता है।
अर्थात इसमें पीढ़ी दर पीढ़ी विशेषताओं की निरंतरता होती है।
** जाति के सदस्यों के बीच लक्षणों में भिन्नताएं, विविधता कहलाती है।
विविधताओं या विभिन्नताओं का संचयन: - विविधता का महत्व केवल तब प्रकट होता है यदि वह कई पीढ़ियों तक संतति या संतान द्वारा वंशागत होता रहता है।
** किसी भी जीव जाति के लिए विविधता का सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि वह परिवर्तनशील वातावरण में उसके जीवित रहने की संभावना को बढ़ा देता है।
** गुणसूत्र DNA की बनी कोशिका के केंद्रक में सूत्रनुमा संरचना होती है जो जीनों की वाहक होती है।
जीन (Gene):- जीन वास्तव में आनुवंशिकता की इकाई है जो प्रजनन के दौरान जनकों से उनकी संतानों को विशिष्टताओं के रूप में हस्तांतरित करती है।
** वह जीन जो किसी वैकल्पिक जीन की उपस्थिति में भी किसी जीव के रूप रंग को सुनिश्चित करता है प्रभावी जीन कहलाता है।
** वह जीन जो केवल किसी दूसरे समान जीन की उपस्थिति में किसी जीव के रूप रंग को सुनिश्चित कर सकता है अप्रभावी कहलाता है।
जीनोटाइप => जीनोटाइप किसी जीव में उपस्थित जीनों का वर्णन है।
फीनोटाइप =>फिनो टाइप किसी जीव में उपस्थित विशिष्टता का वर्णन है।
F1 पीढ़ी - जब दो जनक (माता-पिता) संकरण करके संतान उत्पन्न करते हैं उनकी संतान प्रथम संतति पीढ़ी या f1 पीढ़ी कहलाती है।
F2 पीढ़ी - शंकरण करके दूसरी संतान उत्पन्न करती है तो यह f2 पीढ़ी कहलाती है।
संकर पौधे - पौधे की भिन्न किस्मों के संकरण या प्रजनन से उत्पन्न होने वाले पौधे के नए रूप को संकर कहा जाता है।
**ग्रेगर जॉन मेंडल को आनुवांशिकता का पिता कहा जाता है, क्योंकि इन्होंने आनुवांशिकता की खोज की थी।
** मेंडल ने अपना शोध मटर के पौधे पर किया।
** मेंडल ने मटर के पौधे के 7 लक्षणों पर अपना अध्ययन किया।
लक्षणों की वंशागति के नियम :- बताया कि माता एवं पिता दोनों ही समान मात्रा में अनवांशिक पदार्थ को संतान में स्थानांतरित करते हैं।
इस प्रकार की वंशागति के कुछ नियम प्रस्तुत किए जो कि निम्न है।
(1) विसंयोजन का नियम (एक संकर वंशागति):- मेंडल ने मटर के पौधे के अनेक विकल्प इन लक्षणों का अध्ययन किया जो सूक्ष्म रूप से दिखाई देते हैं।
उदाहरण:-गोल झुरीदार बीज, लंबे बोने पौधे जैसे सात विभिन्न लक्षणों वाले मटर के पौधे आदि।
मेंडल ने विभिन्न लक्षणों वाले मटर के पौधे (लंबे/ बोने पौधे) को लिया जिससे प्रथम पीढ़ी में लंबे पौधे प्राप्त हुए।
द्वितीय पीढ़ी ( F2)में जीनोटाइप अनुपात => 1:2:1 (शुद्ध लंबा : संकर लंबा : बोना)
द्वितीय पीढ़ी ( F2) में फेनोटाइप अनुपात => 3:1 (लंबा : बोना)
** मेंडल ने प्रथम पीढ़ी के पौधों को स्वपरागण द्वारा उगाया।
** प्रथम पीढ़ी से उत्पन्न पौधों को एक दूसरे के साथ संकरित करने पर द्वितीय पीढ़ी में अलग-अलग लक्षणों के पौधे उत्पन्न होते हैं जैसे शुद्ध लंबे, संकर लंबे, शुद्ध बोने
** F2 पीढ़ी मे TT:Tt:tt = 1:2:1(एक पौधा शुद्ध लंबा 2 पौधे संकर लंबे एक पौधा शुद्ध होना)
(2) स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम(द्विसंकर वंशागति) द्विसंकर वंशागति में एक ही समय पर विषम लक्षणों की 2 जोड़ियों की वंशागति शामिल होती है। मंडल द्वारा चुने गए विषम लक्षणों की दो जोड़ियां गोल पीले बीज तथा झुरीदार हरे बीज हो सकते हैं।
गोल पीले बीज वाले पौधे का हरे झुरीदार बीज वाले पौधे के बीच संकरण कराने पर प्रथम पीढ़ी में सभी बीज गोल पीले प्राप्त होते हैं। अतः गोल पीला बीच प्रभावी लक्षण है, प्रथम पीढ़ी संतान के स्व निषेचन कराने पर द्वितीय पीढ़ी की संतान में कुछ गोल पीले बीज, कुछ हरे झुरीदार बीज कुछ झुरीदार पीले बीज तथा कुछ झुरीदार हरे बीज प्राप्त होते हैं।
फेनोटाइप अनुपात=> 9:3:3:1 (गोल पीला : गोल हरा : झुरीदार पीला : झुरीदार हरा)
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